Tuesday, 2 June 2020

कामगार / कवयित्री - कंचन कंठ

कविता 

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मन में  धुन है कि
कुछ रचूँ नवल
कुछ भाव धवल
आंखों में छाये
मधुर सपनों के बादल

पर आह ये हो कैसे
हो क्यों कर
आती हैं हर दिशा
से मायूसियों की ख़बर
दिल में उठते हैं भंवर

ये हाल, परेशान लोग
जान- बेजान लोग
कहां से चले, कहां तक चलें
लेकर फफोले दिलों में
पावों में छाले घने

क्यूं  होती न इनकी भोर
क्यूं  सुनता न कोई शोर
कब तक आखिर कब तक
छले जाएंगे ये
 कौड़ियों के मोल लुटाने को
 अपने श्रम को

आ जाते गांवों से शहर बसाने को
बसते ही शहर धकेल दिए जाते
गंदगी कहकर ठेल दिए जाते
अब तो कुछ हो राह आसान
हैं बुत नहीं, जिंदा इन्सान.
....
कवयित्री - कंचन कंठ 
कवयित्री का ईमेल आईडी - kanchank1092@gmail.com
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Tuesday, 26 May 2020

कुछ रह गया शायद / कवि - आनंद रंजन 'पथिक'

कविता

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सुबह सवेरे उठा जब
सपना अधूरा छोड़ क
लगा जैसे कुछ रह गया शायद।
करता और भी क्या
रोजमर्रे के क्रियाकलापों को छोड़कर
भाग-दौड़ ऐसी जैसे
कोई 20-20 मैच हो  शायद।

आधी चाय आधी चढ़ी बाजू
नाश्ता भी आधा छोड़ा
दफ्तर के आधे रास्ते
लगा कुछ रह गया शायद।
पहुंचते ही दफ्तर
अविरल सूची में दो-चार काम और जोड़ा
एक-एक को निपटाते भी
लगा जैसे कुछ रह गया शायद।

दो पल सांस लेकर
किसी अपने से दिल के तार जोड़ा
सूची वाला रावण ऐसा चीखा
मानो सब कुछ बिखड़ गया शायद।

सब की उम्मीद तले
अपनी आकांक्षाओं ने दम तोड़ा
खुश करते-करते सब को भी
लगा कुछ रह गया शायद।

शाम हुई आया खुद का वक्त
शिथिल पड़े मन को झकझोड़ा
ये करूं या वो करूं
ऐसी ही उधेड़बुन में डूबा रहा शायद।

हर शाम यूँ बीता जैसे
टेस्ट मैच कोई ड्रॉ पे छोड़ा
सुलझे अनसुलझे पहलुओं को
यूँ ही पार लगाता रहा शायद।

आंखें खुली, था पहले किरण का वक्त
बरबस आया याद रोजमर्रा वो तल्ख
क्या ऐसी भी थी दिन की कवायद
सच में न थी एक पल की फुर्सत
न एक पहर को अपनाने की जुगत
आज लगा क्या क्या रह गया शायद

जब मिले हैं फुर्सत के चार पहर
बिखरे बिछड़े पलों में कर रहा हूं सफ़र
चला हूं जीवन के पथ पर अग्रसर
अविरल 'पथिक' को न रोकेगा ये कहर
उल्टे पांव जाते कहेगा "कुछ रह गया शायद"।
.....
कवि - आनंद रंजन 'पथिक'
कवि का ईमेल आईडी - eeanand@yahoo.com
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Monday, 25 May 2020

पापी पेट के लिए जागता दौड़ता शहर / कवि - विजय बाबु

कविता

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वर्तमान के गर्त से निकली ये चिंगारी
क्या पता अब कब, कौन
शहर खुद चले गाँव की ओर
या गाँव ही शहर को दे जनम
पर जालिम पापी पेट है
कि यह भूख ही शहर तक ले गया
पेट भरा तो शहर के साथ दौड़ा
बदले में शहर ने ही शरण दिया,
पर अब फिर वही पापी पेट
और उसी भूख ने ही किया वापस
जीते रहने की ख़्वाहिशों के बदले हज़ारों मील
तय करने को विवश किया ।

न जाने क्यों एतवार हो गया
शहर को सिर्फ शहर पर 
और जागा प्यार गाँवों का फिर गाँव से
न जाने कब कौन, कहाँ अब
फिर से इक नये जन्मे शहर को जीवित कर
 बसे बसाये शहर को ही वीरान कर दे 
और कहे कि
पापी पेट ही है सबका मालिक,
जागता शहर तो बस बानगी भर है
तो ऐ शहर बंद कर इठलाना अभी
देख पापी पेट स्वयं तुझे मौका देगा 
इठलाने का फिर इक बार 

देगा, क्योंकि तुझे जागते हुए ही
दौड़ते हुए ही 
और सजते-सँवरते हुए ही  देखा
 तो आज सोते, रोते
हुए देखा तो जी घबराने लगा,
लगा कि गाँव तो अपना था मगर
तू भी तो सपना था 
जिसे साकार करने हम पापी पेट लेकर जो निकले थे
आये थे निकल कर दूर कूच करने को,
और शहर दर शहर संवारने क्योंकि
पापी पेट ही है सबका मालिक
तू तो महज़ निमित्त मात्र है शहर
और हमारा-तुम्हारा मिलन ही सत्य है ।

तो सोच जरा एक पुल को बनाने की
ताकि पापी पेट भी भरे 
और तेरे
जैसे सब शहर भी सजे
 इस कोने से उस कोने तक सजता रहे 
क्योंकि,
अपना तो ढर्रा रहा है इस धरा पर
शहर भूखा तो पेट भी भूखा रहे
पेट भूखा तो शहर भी रोता रहे
तो गाँव ही शहर बन 
तो आ सकूँ पास पुल के
और तू भी चल ऐ शहर मेरी ओर
कि दोनो ही बढ़ा सके अपने कदम
और चरण-थाप की चिंगारी में 
हँसे तुम और हम।
....
कवि -  विजय बाबु
कवि का ईमेल आईडी - vijaykumar.scorpio@gmail.com
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Sunday, 24 May 2020

अम्फान तूफान / कवि - जगदीप सिंह मान 'दीप'

कविता 

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अम्फान ने दिखाया तांडव
भय से भीत हुआ है मानव
मौसम विभाग बता रहा
सदी का सबसे भयंकर मंजर
ख़ौफनाक होकर ऊपर उठ रहा समंदर

क्रूर हो गया पारावार
जा पहुँचा घर द्वार
टूटे आशियाने मचा हाहाकार
बेबस जीव करे क्या उपचार?

सनसनाती हवाएंँ
 डूबती नौकाएं
बिलबिलाते बच्चे काँपते गात
अपनों से ही छूट रहे अपनों के ही हाथ

खौफ में मानव बस्तियांँ 
हिल गई बड़ी-बड़ी हस्तियांँ

बर्बरतापूर्ण होकर बढ़ रही लहरें
 गिरफ्त में आ गए गाँव-शहर
जीवन जीना मुहाल हुआ
 मौत सिर पर मंडरा रही आठों पहर
आम जीवन अस्त-व्यस्त
 जान हथेली पर रखकर भाग रहे इधर-उधर

अम्फान का पश्चिमी बंगाल और ओडिशा पर कहर
पल-पल में उगल रहा है ये  अपना जहर

पता नहीं जीवन कब पटरी पर लौटेगा?
पता नहीं प्राकृतिक आपदाएं कब तक खेलती रहेंगी खेल?
क्या ऐसे ही मनुज का निकलता रहेगा तेल?

क्या यही है जीवन सार?
कभी दबदबा होता है कभी होता तार-तार।
.....
कवि - जगदीप सिंह मान "दीप"
परिचय- हिन्दी शिक्षक, राजकीय बाल वरिष्ठ उच्च माध्यमिक विद्यालय, लाडपुर, दिल्ली
शिक्षा निदेशालय, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, भारत।
ईमेल आईडी- jagdeepmaan1044@gmail.com

कवि जगदीप सिंह मान 'दीप' 

Thursday, 21 May 2020

निष्पक्ष बयान /कवि - वेद प्रकाश तिवारी

कविता 

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यह सिर्फ भ्रांति है कि
कविता होती है 
कवि की कल्पना मात्र 
जिसे वह देता है कलम की धार
पर कविता की वास्तविकता 
जुड़ी है उस दर्द या पीड़ा से 
जिसके अनुभव से गुजरा है कवि
चाहे वह अपनी हो या पराई 
या हो शामिल 
संपूर्ण मानव समाज 
या जुड़ा हो प्रकृति का कोई पहलू
इसी को अपनी लेखनी से 
कवि देता है मूर्त रूप 
यदि पाठक निष्पक्ष भाव से 
करे विचार 
तो कविता बोल उठेगी 
कि तुम भी हो कहीं ना कहीं 
मुझमें शामिल 
कविता रखती है अपनी गरिमा 
वह नहीं करती पसंद ओछापन
नहीं बंध सकती छंदों में 
तब तक 
जब तक कि वह न गुजरी हो 
किसी गहरे अनुभव से
कविता समेटे रहती है 
अपने में सुख-दुख 
उम्मीद, संवेदना ,दर्द,
शक्ति और प्रोत्साहन जैसे 
अनछुए पहलुओं को 
तभी तो अत्यंत पुरानी कविता भी 
हर युग में लगती है जीवंत । 
........

कवि - वेद प्रकाश तिवारी 
कवि का ईमेल आईडी - vedprakasht13@gmail.com
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Wednesday, 20 May 2020

शब्द संसार / कवयित्री - मीनाक्षी डबास 'मन'

कविता

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शब्द आवरण, शब्द जागरण
शब्द समय का सार।
शब्द बिना है सूना देखो
यह सकल संसार।

शब्द बनाए, शब्द बिगाड़े
दुनिया को यह नाच नचाए।
कभी गीत का राग बने तो  
कभी तीखी धार हो जाए।

शब्द हंसाए, शब्द रुलाए
भिन्न भिन्न यह रूप सजाए।
 कभी सार्थक, कभी निरर्थक,
वर्णों का ऐसा मेल बिठाए। 

शब्द मित्र, शब्द ही शत्रु
कैसे –कैसे संबंध बनाए।
मीठा बोलकर मेल कराए
जहर बने फिर भेद कराए ।

शब्द लघु, शब्द विशाल है 
चरित्र इसी से आंका जाए।
दुष्टों का हथियार कभी यह 
संतों का आशीर्वाद बन जाए।

शब्द प्रेम, शब्द द्वेष भी
भावाविष्ट हो जो बोल जाए । 
प्रेमी विहग रोमांच से फूले
बैरी जन के मन को जलाए ।

शब्द भूत, शब्द आज है
युगों-युगों तक फैला जाए । 
अकबर-अशोक रहते इसमें
क्या होता, उसका ज्ञान कराए। 

शब्द कबीर, शब्द है तुलसी 
भक्ति के न्यारे पंथ सुझाए।
एक समाज को सत्य दिखलाए
एक समन्वय का अलख जगाए।

शब्द है हिन्दू, शब्द मुसलमान
आस्था के भिन्न रूप कहाए। 
जीवन का कल्याण करो सब
हर धर्म यही सिखाता जाए।

शब्द प्रजा, शब्द ही शासक
निज दायित्व का बोध कराए।
देश-रक्षा प्रथम उद्देश्य हो
वरण करो चाहे पृथक उपाय।

शब्द मौन है, शब्द मुखर है
कहे कभी मन राखा जाए।
विचार बहें अंतरतल पर
जिह्वा से प्रकट हो जाए। 

शब्द कवि, जो बना रवि है
निज भाव से जग को जोड़े जाए।  
छंद, रस, अलंकार, वक्रोक्ति 
शब्दों का सुंदर मेल बिठाए।
....

कवयित्री - मीनाक्षी डबास "मन" 
परिचय - प्रवक्ता हिन्दी 
राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार शिक्षा निदेशालय दिल्ली भारत  
कवयित्री का ईमेल आईडी - Mds.jmd@gmail.com 
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Monday, 18 May 2020

श्रमिक / कवयित्री - दीपा आलोक

कविता 

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बेघर हूँ बन गया पथिक 
हाँ मैं हूँ लाचार श्रमिक।
हर निर्माण में करूँ योगदान 
उद्योग सड़क या हो मकान ।

जाने  कैसा टूटा ये कहर 
जर्जर हो गया मेरा घर 
भाँप कर मेरी वेदना 
दी जी भरकर संवेदना 
न मिली मदद मुझे इस पहर । 

तोड़कर अपना आशियाना 
छोड़कर अपना ठिकाना 
निकल पड़ा करने मैं सफर 
था ज्ञात मुझे लम्बी है डगर 
स्वजन - परिजन थामे हाथ 
मिला अपने जैसों का साथ 
साहस हिम्मत और धैर्य 
इतना बटोर बढ़ चले पैर ।

संकल्प मन में  ठाना था 
कठिनाइयों से अनजाना था 
निराहार निर्जल था ये व्रत 
हो चला था मैं भी क्षत - विक्षत 
बच्चों की देख मैं सूरत 
ली प्रेरणा कर ली हिम्मत 
साहस हिम्मत और धैर्य 
इतना बटोर फिर चले पैर ।

दिन बीते पर न टूटी आस 
कर संघर्ष पहुंचा आवास 
यूँ लगा कि जैसे भोर हुई 
नव दिन निकला नव आस बँधी 
अब थी एक नयी तलाश ।
घर पहुँच गया 
पर हाय ! ये पेट की आग 
फिर मुझे पड़ेगा संवारना 
परिवार घर को संभालना 
करना फिर मुझको योगदान 
करना नित मुझको नव निर्माण ।
.....

कवयित्री - दीपा आलोक 
कवयित्री का ईमेल आईडी - deepaalok2@gmail.com
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कवयित्री - दीपा आलोक