Monday, 4 May 2020

युवा कवि हेत राम भार्गव / "कहो मुझे भगवान" और अन्य कविता

1 कहो मुझे भगवान


(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए



जब जन्मीं ममता के आंचल,
हंसकर मां ने गले लगाया l
सबने बता कर भार घर का
खुशियों से मुझको ठुकराया l
तूँ ही बता मेरी जग में, है कैसी पहचान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं , कहो मुझे भगवान ?

शिशु का रोना मेरा
सब के कानों को कहराता l
पिता के पैरों की मैं बेड़ियां
हर कोई मुझे यही बताता था l
तूँ बता ईश्वर मुझको कहां मिलेगा सम्मान ?
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

टपकते आंसुओं सा बचपन,
कोई समझ नहीं पाया l
सब के बाद की पात्र कहकर
बेटों से अलग बताया l
घुटती रही इच्छाएं मेरी, टूटते रहे अरमान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

सदा पराया कहकर मुझको,
भाई जितना मान न पाया l
अबला मानकर वंचित किया,
कहीं पूरा सम्मान न पाया l
प्राण है मुझ में, प्रतिवेदना भी, मुझ में भी है जान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं ! कहो मुझे भगवान ?
नहीं पढ़ाया मुझको इतना,

नहीं मिल पायी सुविधाएं l
लड़की होने की अपराधिन,
बनी जीवन की बाधाएं l
सदा उलाहना में बीता, जीवन बनकर वर्तमान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

हंसी-खुशी खेल की ठिठोली,
खुलकर खेल भी न पायी l
जिस मां ने जन्म दिया,
वह भी कहती मुझे परायी l
धन पराया साबित हो गई, होकर सनाथ संतान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं ! कहो मुझे भगवान ?

मेहंदी रची हाथों पर मेरे,
जब हुई मेरी विदाई l
पराए घर जा रही थी,
मैं होकर ओर भी परायी l
धन्य हुए माता-पिता मेरे, करके मेरा कन्यादान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं , कहो मुझे भगवान ?

बेटी थी तब भी परायी,
बहू बनकर भी ओर परायी
काट रही हूं अपना जीवन l
ईश्वर! होकर तेरी परछाई l
सब मौन है इस प्रश्न पर, मैं हूं किसका स्वाभिमान ?
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?


2. बेटी : चित्कार मेरी

कोई छोड़ गई निर्मोही ममता

मुझे जन्म देने के बाद 
क्यों रचना की तुमने प्रभु
सुन मेरी फरियाद l
मैं रो रही थी कचरे के ढेर में
किसी ने नहीं सुनी मेरी पुकार l
कीड़े मुझको काट रहे थे
कोई नहीं सुन पाया मेरी चित्कार ll
नोच नोच कर कुत्तों ने खाया
फिर भी बचे रहे मेरे प्राण l
निर्दयी हुई मेरी ममता कितनी
उतना ही तू निर्दयी भगवान ll
चीखना मेरा सुनकर कोई
दौड़कर वहां पर आया l
गोद उठाकर मुझको उसने
अपने गले लगाया ll
ममत्व प्यार लुटा कर
उसने वात्सल्य में पाला l
खिली कली मैं, उसकी बेटी
वह भगवान सा मेरा रखवाला l
बेटी होना अपराध क्यों है
यह समझ में नहीं आया l
जब बेटी ही है सृजना सृष्टि की
जिसे भगवान ने स्वयं बनाया l

कवि- हेतराम भार्गव  "हिंदी जुड़वाँ "
परिचय - (हिन्दी शिक्षक) राजकीय मॉडल उच्चतर शिक्षा विद्यालय करसान चंडीगढ़
शिक्षा विभाग केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़
कवि का ईमेल आईडी - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Sunday, 3 May 2020

युवा कवयित्री मीनाक्षी डबास 'मीनू' की कविताएँ - "रिमझिम रिमझिम" और अन्य

कविताएँ
(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




1 रिमझिम रिमझिम

रिमझिम रिमझिम
बरसे फुहार
मन नाचे मेरा
करे पुकार l
रिमझिम रिमझिम
बरसो पानी
भू पर लिख दो
फिर नई कहानी
रिमझिम रिमझिम
कदम बढ़ाए
डालों को तुम
चलो भिगोए l
रिमझिम रिमझिम
मद्धम मद्धम
मिट्टी के कण में
बस जाओ
रिमझिम रिमझिम
नाच नाच के
नदियों से तुम
आन मिलो, अब
रिमझिम रिमझिम
कूद फांद के
चट्टानों से भिड़ जाओ
रिमझिम रिमझिम
नाच नाच के
बच्चों का भी
जी बहलाओl
,,,,,

2 मोबाइल देवता

मोबाइल जी आप तो हो सबसे बड़े देवता
आपके बिना तो किसी का न दिन न रात l
बच्चा बूढ़ा, नाटा, मोटा या कोई पतला
सब तुम में लीन, न करते किसी से बात l
आज चहूं सिर्फ आपकी ही चर्चा
आधीन हुआ मानव, तूँ बना सबका खास l
घर गृहस्थी संबंध सब तू ही जग में
अंगूठे के स्पर्श में देखो सिर्फ तेरा एहसास l
छूट गए माता पिता बंधु प्रिय सब
बना चहेता तू सबका स्मार्ट जीवक अंग l
सबके ही हाथों में तू प्रसाद हुआ अद्भुत
कर दिए दीप पूजा ध्यान आती नमाज भंग l
एकांत मुस्काए एकांत रोए एकांत शांत है
साथ बैठे लोग फिर भी बना दिये अनजान l
किसी को किसी से न मतलब रहा अब
रिश्तो में भी बन बैठा तू रिश्तेदार महान l
दूर देशांतर की जिजीविषा में तूँ मुस्कान भरे
सूने घर परिवार में तूँ खुशियां लेकर आता l
दूर बैठों की बस तू ही एक आस बना
सभी काम बने बैठे तूँ जीवन आसान बनाता l
तू जगत का साक्षात देव बनकर
इस भू पर नए चमत्कार लेकर आया l
हर पल सब तेरा ध्यान करे पल पल
तू बन गया सबके जीवन का साया l
तेरे आगे बन बैठे सब नाते रिश्ते बौने
मानव को झूठ सच सब तू ही बुलवाता l
तेरा ही सहारा लेकर दुनिया चले अब
झूठ को सच सच को झूठ तू सब बनाता l
नन्हे नन्हे बाल मोहित तुम पर आंखें खो रहे
सब खेल में डूबे बना इनका भी प्रिय वरदान l
नादान दुनिया नहीं जानती मैं जानना चाहे
तूँ क्षरण करता जीवन तू है इतना महान l
घर में दो राह पाट दिए रिश्ते तूने बांट दिए
तू ही मियां बीवी के झगड़े झपट की मूल l
साथ-साथ सामाजिक जीवन भूले सब
आज एक यंत्र के गुलाम सब कितने नादान l
मोबाइल तूँ वास्तव में है महामंत्र महायंत्र है
तू मायाजाल महाकाल जिससे सब अनजान l
,,,,,,

कवयित्री - मीनाक्षी डबास 'मीनू'
परिचय - (हिंदी प्रवक्ता) राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार
शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली
कवयित्री का ईमेल आईडी - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Saturday, 2 May 2020

युवाकवि हरिराम भार्गव की कविताएँ -"मेरे घर बया का घोंसला" और अन्य

कविताएँ
(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




1. मेरे घर बया का घोंसला 


नन्हें नन्हें नादान परिंदे
मेरे आंगन में मंडराते हैं 
पीछे पीछे दौड़े 
वे भागमभाग करते हुए 
बेलों के नीचे छुप जाते हैं 
घीया लौकी तोरी हरे- हरे 
ये छुपे हुए इनमें बिना डरे 
यहीं है घर इनका अपना 
यही रोज ठिकाना हुआ 
उड़ना अभी सीख रहे 
सब छुपे हैं, पर दीख रहे 
आंखें मटका मटकाकर 
अपनी ताकत दिखा रहे 
प्यारे-प्यारे नन्हें दुलारे 
मेरा आंगन महका रहे l

मैंने पूछा  मां से - कहां से आए? 
मां बोली - यह घर है सबका l
इनका भी घर, तेरा भी घर 
सबको प्यारा होता है घर
एक दिन बया आयी थी 
तिनके बिनकर कर लायी थी 
देखा गौर से मैंने जब 
उड़ी नहीं, वह रुकी रही 
घर के आले में ठहरी
समेत सारे तिनके 
एक घोंसला बनाया 
कुछ दिनों बाद देखा 
तीन अंडे चमक रहे 
नए जीवन की आशा में 
हमको कुछ कह रहे 
ममता जगा गयी बया 
एक कहानी बना गयी, 
हे बया फिर से 
घर की रौनक बढ़ाओ 
आओ बया मेरे घर आओ 
आकर घोसला बनाओ l

प्यार बांटते हैं पक्षी 
हिलमिल रहते सारे 
न कोई झगड़ा 
न कोई फसाद करे 
जीवन जीने की राह
हमको ये सिखाते 
फिर आग आगे आना बया
फिर मेरा घर सजाना बया
चहचाहट प्यारी सुंदर 
हम सबको भाती हैं 
नन्हें-नन्हें चीजों की अठखेलियां 
खुशियां देकर जाती हैं, काश! 
हम भी पक्षी बन जाएं 
संग इनके घोंसला बनाएं 
हम भी पक्षी बन जाएं 
संग इनके घोषणा बनाएंl
...


2 बादल 

आ रे बादल प्यारे बादल
घनघोर घटा छा रे बादल 
सूना पड़ा सारा संसार 
जीवन पुकारे बेशुमार l
रिमझिम रिमझिम 
बूंदों की ठंडी फुहार 
धरा पर बरसा रे बादल l
सूरज की धूप तपती
किसान थका हुआ है 
उसके घर झोलीभर 
खुशियां बरसा रे बादल l
बैलों के पैर जल रहे हैं
खुर में पड़े घाव भर जा 
शीतल धरा को कर जा 
आ रे बादल प्यारे बादल l 

पेड़ों पर मुरझाए पत्ते 
सूखी डाली डाली 
तेरी आस लगाए बैठी 
कृषकाओं की लाली 
इंतजार कर रही, दुल्हन
पिया मिलन की आस 
तेरे बरसने को ठहरी 
उसको तुझपर विश्वास l

सबका विश्वास, बन 
लौट ला होठों की मुस्कान 
मृग प्यासे दौड़े भागे 
मृगमरीचिका की लालसा 
प्राण छीन रही रे बादल l

कहीं प्यासे पपीहे कीर 
कहीं भूखे हैं चौपाये 
सब पानी पानी रोते 
अपना दर्द छुपाये 
कौन किसकी सुनता रे बादल l 
तू तो सुन, तू सबकी आशा 
रिमझिम रिमझिम 
बूंदों की ठंडी फुहार 
धरा पर बरसा रे बादल l

कवि - हरिराम भार्गव "हिंदी जुड़वाँ " 
परिचय - (हिंदी शिक्षक) राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय पूठकलां दिल्ली
 शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली
कवि का संयुक्त ईमेल - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Friday, 1 May 2020

धर्म और अध्यात्म / डॉ. सुधा सिन्हा

विमर्श 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए





धर्म और अध्यात्म दोनों दो चीजें हैं। पूजा पाठ धर्म है ।

धर्म के तरीके अलग हो सकते हैं। इसलिए धर्म के नाम पर झगड़े होते हैं पर अध्यात्म के नाम पर नही। सबों से प्यार करना अध्यात्म है।एक लाइन में अपने रुप का‌ सर्वत्र दर्शन अध्यात्म है। दूसरो के दुख दर्द
को महसूस करना अध्यात्म है।

विश्वबंधुत्व की भावना रखना अध्यात्म है।

आज पारंपरिक पूजा की आवश्यकता नहीं। विवेकानंद ने कहा सेवा ही धर्म है। सभी समसामयिक दार्शनिकों ने इसी बात पर बल दिया है। ईश्वर हर किसी में आत्मा के रूप में अवस्थित है। सबों से प्यार करना ईश्वर के करीब‌ जाने का आसान रास्ता है।सुकरात ने कहा था know thyself अर्थात अपने-आप को जानो। प्रत्येक व्यक्ति के परिवार समाज एवं राष्ट्र के प्रति अलग अलग अधिकार और कर्तव्य होते हैं।उन अधिकारों एवं कर्तव्यों की पकड ही अपने आप को जानना‌ है।अगर प्रत्येक आदमी अपने अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सहज हो जाते तो उसका जीवन सहज हो जाय।

आज अध्यात्म नये रंग रुप में हमारे समक्ष है।अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को पकड़ कर उनके अनुसार जीवन मापित करना ही आध्यात्म है। आधुनिक दार्शनिकों ने कर्म पर ज्यादा बल दिया है। जो जिस क्षेत्र में है अगर अपना कर्म कर रहा है तो वह अध्यात्म की जिंदगी जी रहा है। कर्म अनासक्त होकर करना है। इसे ही गीता में अनासक्त कर्म कहा गया।

एक पंक्ति में सही ढंग से जीना ही अध्यात्म है।
........

कवयित्री - डॉ. सुधा सिन्हा 
कवयित्री का ईमेल - sinhasudha017@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Wednesday, 29 April 2020

मनु कहिन (26) - "वी आर बोर्न तो रूल"

विमर्श 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




कभी कभी लोगों की मानसिकता पर तरस आता है। कैसी सोच है उनकी। अगर थोड़ा बढ़कर बोलें तो कह सकते हैं बड़ा ही अमानवीय दृष्टिकोण है। एक अलग ही नजरिया है लोगों को देखने का ! आपको लगता है कि आप इस सोच , इस नजरिए के साथ आगे बढ़ सकते हैं ! जीवन मे तरक्की के साथ ही साथ बहुत कुछ पा सकते हैं !पर, यह भूल है आपकी ! इस तरह की मानसिकता और सोच कभी भी आपको एक तय मुकाम से आगे बढ़ने ही नही देगी। जहां पूर्ण विराम लगना चाहिए था, उससे बहुत पहले ही लग गया। आपको लगेगा कि आपने बहुत कुछ हासिल कर लिया है पर शायद आप दृष्टि-दोष के शिकार हैं। आपने क्या खोया या कहें खो दिया, आप नही देख पा रहे हैं। इतिहास गवाह है जीवन मे आगे, बहुत आगे बढ़ने के लिए आपको अपनी सोच और मानसिकता मे परिवर्तन लाना ही होगा।

किसी ने मुझे एक वाकया सुनाया। नाम नही लेना चाहिए मुझे उस व्यक्ति का।  क्या जरूरत है नाम लेने की।  खैर ! वो व्यक्ति एक प्राइवेट कंपनी मे एक अच्छे ओहदे पर नौकरी किया करता था। अच्छी तनख्वाह थी। काम का दवाब था पर, एक अच्छी तनख्वाह आपके बहुत सारे दुखों को काफी हद तक दूर कर देती है। परिवार - बच्चों का सुकून आपकी प्राथमिकता बन जाती है।बदले मे आप काफी कुछ छोड़ जाते हैं । बहुत कुछ आपसे ले लिया जाता है !जिसका पता शायद ताजिंदगी नही चल पाता है। क्योंकि आपने कभी अपने बारे मे नही सोचा। कभी जगह नही दी अपने आप को। 

खैर , चलिए मुद्दे पर आते हैं। जिस कंपनी मे वो व्यक्ति काम किया करता था, उसी कंपनी का एक पुराना मुलाजिम, एक ड्राइवर वेलू हुआ करता था। उम्र करीब पचपन से साठ के बीच की रही होगी। वेलु ने बतौर ड्राइवर अपनी सेवाएं कंपनी के तत्कालीन मालिक को तो दी ही,आज के मालिक की सेवा मे भी वह व्यक्ति लगा हुआ  था। कंपनी के तमाम स्टाफ उसके उम्र और व्यवहार को देखते हुए बड़ी इज्जत किया करते थे। एक दिन की बात है। कंपनी की राजमाता -- जी हां, उन्हें राजमाता संबोधित करना ही उचित होगा। भाई, आज के कंपनी के मालिक की मां जो ठहरीं। किसी प्रसंगवश कंपनी के मालिक के लड़के ने जिसकी उम्र लगभग छः या सात वर्ष की होगी, राजमाता की उपस्थिति में वेलु को  वेलु अंकल कह कर संबोधित  कर दिया। वेलु अंकल, उस बच्चे ने बिल्कुल सही संबोधन किया। ज्यादा उचित तो वेलु बाबा होता। खैर! अब आप राजमाता की त्वरित प्रतिक्रिया सुनें जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से सबके सामने अपनी भौंहें तरेरते हुए दिया ------ " वेलु अंकल नही ! वेलु कहो! 

सच है - "वी अरे बोर्न तो रूल!"  क्या कहेंगे एसी मानसिकता को आप ! आपको नही लगता है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग मानसिक विकृति के शिकार हैं!

आप जो भी करते हैं। जैसा भी व्यवहार करते हैं। सार्वजनिक तौर पर आपका रहन सहन। आपके काम करने का तरीका। आपके बात करने का तरीका! यह आपका अपना मनोविज्ञान है।हर व्यक्ति अपने मनोविज्ञान से ही बंधा होता है। और मनोविज्ञान का एक चरित्र के रूप मे विकसित होना एक दिन की बात नही।
........

लेखक - मनीश वर्मा 
लेखक का ईमेल - itomanish@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Monday, 27 April 2020

तुम्हें मैं प्यार करती हूँ तेरे बिन जीना मुश्किल है / डॉ. सुधा सिन्हा

ग़ज़ल

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




तुम्हें मैं प्यार करती हूं तेरे बिन जीना मुश्किल है
कभी ख्वाबों में आ जाओ इसे सम्भालना मुश्किल है

देखो सन्नाटा पसरा है बगिया में फूल नहीं खिलता
दिल की महफिल भी है सूनी, यहां गुल खिलना मुशकिल है।

कोई महताब नहीं इसके बिना सब में सितम ही हैं
किसी के पास आने से दरवाजा खुलना मुश्किल है ।

मेरे दिल पर तुमहारा ही सदा अख्तियार रहता है
बहुत समझाती हूं तुमको मगर समझाना मुश्किल है

धड़कता दिल जो मेरा है सुधा कहती तुम्हारा है
किसी के लाख कहने पर इसे धडकाना मुश्किल है।
.......
कवयित्री - डॉ. सुधा सिन्हा 
कवयित्री का ईमेल - sinhasudha017@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Thursday, 23 April 2020

"हाँ मैं स्त्री हूँ" और "कितना सुंदर मेरा बिहार" (कविताएँ)

कविताएँ

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए



हाँ मैं स्त्री हूं
 *मूल- सविता झा 'सोनी' (मैथिली)* /  अनुवाद - मानस दत्ता

 हाँ मैं स्त्री हूं
 तभी तो हर बात पर
 रोते-रोते भी
 मुस्कुरा देती हूं
  हाँ मैं स्त्री हूं।

 मेरे स्वभाव केअनेक
 रूप देखिए
 सबमें शक्कर जैसे
 मिल कर मिठास लाती हूं
 मुझे पत्थर समझो या
 फिर मोम का पुतला
 मैं खुद ही अपने
 दु:ख से स्नान कर लेती हूं
 हाँ मैं स्त्री हूं।
 तभी तो हर बात पर
 रोते-रोते भी मुस्कुरा देती हूं

 परिणय वेदी के
 उन 'सातों वचन' को मान
 आपके कदमों से कदम
 मिला देती हूं
 अगर थोड़ा सा भी
 आप डगमगाते हो
 मैं तुरन्त
 सिहर जाती हूं

 हाँ मैं स्त्री हूं !
 तभी तो हर बात पर
 रोते-रोते भी मुस्कुरा देती हूं
 हाँ मैं स्त्री हूं ।
.......
           


 कितना सुन्दर मेरा बिहार
कवयित्री - चंदना दत्त

 रत्नजडित मेरा बिहार
 मिला बुद्ध को ज्ञान जहां
 पीपल बरगद आम जहां
 चहुंदिस धान के खेत जहां
 कर्मठ लोग से भेंट जहां
  कितना सुन्दर मेरा बिहार
 रत्नजडित मेरा बिहार

 उच्चैठ भगवती का धाम जहां
 हो गये कलिया कालीदास जहां
 कोयल की कूक गुन्जार जहां
 सुरभित पुष्पित उद्यान जहां
 कितना सुन्दर मेरा बिहार
 रत्नजडित मेरा बिहार ।

 पनिभरनी की बोली संस्कृत जहां
 शंकराचार्य हुए पराजित जहां
 भारती मंडन गांव के गांव जहां
 कपिल कणाद का भान जहां
 कितना सुन्दर मेरा बिहार
 रत्नजडित मेरा बिहार ।

 लालदास की रामायण जहां
 महासुन्दरी बिमला सी बामा जहां
 राजनगर का नौलखा धाम जहां
 सीता ने लिया अवतार जहां ।
 कितना सुन्दर मेरा बिहार
 रत्नजडित मेरा बिहार।
.........
मूल रचनाकार - हाँ मैं स्त्री हूँ (सविता झा सोनी)
अनुवादक - मानस दत्ता
मूल रचनाकार - कितना सुंदर मेरा बिहार (चंदना दत्त)
*श्री मानस दत्ता, श्रीमती चंदना दत्त के पुत्र हैं.
चंदना दत्त का ईमेल -
चंदना दत्त का पता - रांटी, जिला - मधुबनी (बिहार)
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com