Wednesday, 12 August 2020

कलयुग के नन्दलाल / कवयित्री - प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ'

कविता 

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यदि भगवान श्री कृष्ण उस युग मे होते तो उनकी छवि कैसी होती -

मेरे घर आए नन्दलाल बिरज से

ठुमक-ठुमक कर चलत हैं घर में

पांव की थपकी पैजनियाँ बजत हैं

गुस्सा में धरती पर नाक धरत हैं

मेरे नन्दलाल आपन बिरज में।


नाहि मिलत है माखन मिसरी

और    ना ही    दूध    मलाई

अंगूठे  को  मुख  में  धर कर

खूब ऊ  रस-पान   करत    हैं

मेरे नन्दलाल आपन बिरज में।


नाहि संग  ग्वाल-बाल  का

और ना ही  दही  की मटकी

प्याला फोड़ कर दूध चटत हैं

चॉकलेट, बिस्कुट  मुख में धरत  हैं

मेरे नन्दलाल आपन बिरज में।


बांसुरी  का अब  युग  नाहि

अब तो सीटी बजत है

कलयुग के हैं मेरे नन्दलाल

निद्रा में भी कलम हाथ धर

युग महिमा बखान करत हैं।

......

कवयित्री -   प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र'

कवयित्री का ईमेल आईडी - kinshukiveerji@gmail.com

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Friday, 7 August 2020

मनु कहिन - कोलकाता डायरी (भाग-5)

सन्देश और रसोगुल्ला की सबसे पुरानी दुकानें 

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कोलकाता  ' सिटी ऑफ जॉय ' आप कह सकते हैं ।  वाकई यह सिटी ऑफ जॉय है। खुशियों का शहर है यह। महानगर होने के साथ-साथ अपनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखना आप कोलकाता वासियों से सीख सकते हैं । अन्य महानगरों की तरह यहां भी बाहर से बहुत लोग आए । कुछ काम की तलाश मे तो कुछ नौकरी और व्यवसाय करने । पर, वो जहां से भी आए यहां आकर वो कोलकाता वाले हो गए। यह खासियत है इस शहर की। आपको अपने आप मे समेट , अपना बना लेता है । आप यहां की सभ्यता और संस्कृति मे रच बस जाते हैं।
 
बात कोलकाता की हो और मिठाइयों का जिक्र न हो खासकर कोलकाता के फेमस संदेश का तो फिर बात कैसे बनेगी! संदेश की बात हो  तो आप गिरीशचंद्र डे और नाकुर चंद्र नंदी मिठाई की दुकान को कैसे भूल सकते हैं। 1844 में इस दुकान की स्थापना गिरीश चंद्र डे और नाकुर चंद्र नंदी ने कोलकाता शहर के गिरीश पार्क स्थित रामदुलाल सरकार स्ट्रीट मे  की थी। रिश्ते में ये दोनों ससुर और दामाद लगते थे। नाकुर चंद्र नंदी हुगली से कोलकाता आए थे। वो दामाद बनकर आए थे उस वक्त के फेमस मिठाई बनाने वाले श्री गिरीश चंद्र डे के घर।  इतनी प्रसिद्ध दुकान हो तो स्वाभाविक है, आपको लगता होगा की एक बड़ी सी दुकान होगी !  दुकान के बाहर एक बड़ा सा बोर्ड लगा होगा !  बाहर एक चमचमाता शीशे का दरवाजा होगा , जो आजकल अमूमन आपको हर बड़े स्टोर मे दिखता है । जिसे खोल कर अंदर जाना होगा । तमाम तरह की मिठाइयां सजी होंगी । हर काउंटर पर एक सजा संवरा सा यूनिफॉर्म पहने हुए सेल्समैन होगा । पर  नहीं ! कोलकाता शहर के पुराने एरिया मे  स्थित यह   दुकान कहीं से भी आपको ऐसा आभास नहीं दिलाता है। जब मैं वहां गया तो मैंने देखा एक पुरानी सी दुकान एक पुरानी सी बिल्डिंग जो वास्तव में आपको याद दिलाती है यह दुकान सन 1844  ईस्वी में खुली थी । हैरिटेज बिल्डिंग है ये।

सामने शीशे के पीछे में संदेश की वैरायटी लगी हुई है । पिस्ता संदेश , ब्लैक फारेस्ट संदेश , चॉकलेट संदेश मैंगो संदेश मौसम के अनुकूल मौसमी संदेश और भी बहुत सारी वैरायटी है ।  हरेक माल रु.20/= आप जो भी संदेश खाना चाहे या ले जाना चाहिए मात्र रु.20 है। अभी के माहौल में जहां कोरोनावायरस ने कहर मचा रखा है दुकान के बाहर एक स्पष्ट संदेश था  "नो  मास्क नो संदेश"।  दुकान के कर्मचारी भी मास्क लगाए हुए थे । दुकान के मालिक जो दुकान के अंदर बैठे थे वो थे डे और नंदी के विरासत की पांचवें जेनेरेशन के  पार्थो नंदी।  मेरी उनसे बात हुई। उन्होंने बहुत सारी बातें बताईं। मिठाई की गुणवत्ता के बारे मे पूछने पर उन्होंने बताया कि मिठाई बनाने के लिए वो बाहर से कोई सामग्री नही खरीदते हैं। सब उनका अपना इन-हाऊस ही होता है । उनके दुकान मे जो संदेश बनता है वो तो शाम होते-होते खत्म हो जाता है। 

बातचीत के क्रम में जब सफेद रसगुल्ला का जिक्र आया तो उन्होंने बताया कि अगर आपने चितरंजन का सफेद रसगुल्ला नहीं खाया तो फिर क्या खाया उससे बेहतर रसगुल्ला आपको पूरे बंगाल में नहीं मिलेगा । मैंने भी लगे हाथों पूछ ही लिया भाई बताइए यह चितरंजन कहां है ! मेरे जेहन में चितरंजन तो कोलकाता से बाहर का एक छोटा सा शहर है जो रेल इंजन बनाने के कारखाने के लिए प्रसिद्ध है । इस बात पर हंसते हुए उन्होंने बताया नहीं यहां से थोड़ी ही दूर पर शोभा बाजार के लाल मंदिर के पास एक  दुकान है उसका नाम चितरंजन है ।आप वहां जाएं और वहां के रसगुल्ला को खा कर देखें । उन्होंने मुझे उसका पता दिया। अब मैं उनसे विदा लेकर सफेद रसगुल्ला की खोज में चितरंजन की ओर बढ़ चला । वाकई जब मैं वहां पहुंचा एक छोटी सी दुकान थी वो। यह दुकान भी लगभग 100 वर्षों से ज्यादा पुरानी थी। मैंने वहां पहुंच कर उनसे रसगुल्ला मांगा। पहले तो दो खाया । वाकई ऐसा रसगुल्ला मैंने पहले नहीं खाया था।  अब मुझे अहसास हुआ आखिर क्यों, यह सफेद रसगुल्ला बंगाल और उड़ीसा के बीच विवाद का विषय था। भावनात्मक मुद्दा था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था।  मैंने वहां से कुछ रसगुल्ले पैक करवाए ,घर लाने के लिए ताकि इसका स्वाद सबकी जुबान पर चढ़ सके।
.......

लेखक -  मनीश वर्मा 
लेखक का ईमेल आईडी - itomanish@gmail.com
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Monday, 3 August 2020

आया आया झूम के सावन महीना (अंतिम सोमवारी के अवसर पर)

कविता

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आया आया झूम के सावन महीना
बहुत ही सुदंर, पवित्र,पावन महीना
भोले झुलाएँ, गौरा झूले झूलना
भोले शंकर को प्यारा सावन महीना 
आया आया झूम के सावन महीना

सावन मास शिवालय में, भक्तों की टोलियाँ 
ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर भक्त भरते  हैं झोलियाँ 
सावन के महीने में भोले का  लगता है भंडारा 
रुद्राभिषेक की देवालयों में  लगती है बोलियाँ 
आया आया झूम के सावन महीना

सावन सोमवार का महत्व बताते है 
सोमवार का व्रत करके स्वर्ग पाते है 
सावन मास व्रत करे, भोले देते वरदान 
शिव शिव जपने से, शम्भु की कृपा पाते है 
आया आया झूम के सावन महीना.
....
कवयित्री - डॉ. अलका पाण्डेय
कवयित्री का ईमेल आईडी - alkapandey74@gmail.com
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कवयित्री - अलका पाण्डेय

Monday, 27 July 2020

कविवर कैलाश झा किंकर को काव्यांजलि / कवि - सुधीर कुमार प्रोग्रामर

कविता 

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अंगिका के सिहारतै कौने
 कौशिकी के सुधारतै कौने

एक मंचों पे सबके लानी के
बारी बारी पुकारतै कौने।
(अंगिका भाषा में)


शारदे में समाया किंकर


कौन सा गीत तू मैया को सुनाया किंकर
जो अचानक ही शारदे में समाया किंकर।

बीस वर्षों की मित्रता थी सहोदर जैसी 
एक झटके में उस पारस को गमाया किंकर।

मान सम्मान में वो स्वर्ण-रजत देने को
सोलवां साल चुनिन्दों को बुलाया किंकर।

भेज दिल्ली के "ग़ज़ल-कुंभ" का न्योता हमको
आज कैलाश पे धूनी क्यों रमाया किंकर?

कार्यशाला में विधाकार बताते मिलकर
"कौशिकी" घर को अचानक ही रुलाया किंकर।

अंगिका के महासचिव खगड़िया वाले
तू तो संध्या के सपूतों को भुलाया किंकर।
...

कवि - सुधीर कुमार प्रोग्रामर
परिचय - प्रदेश महासचिव,  अखिल भारतीय आगे का साहित्य कला मंच (बिहार)
चलाभाष- 9334922674 / 9128152258




Sunday, 26 July 2020

सम्पूर्ण अस्तित्व / कवयित्री - श्रेयसी दत्त

कविता 

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मैं पैदा हुई थीं? या हुआ था?
इस प्रश्न का उत्तर
दाय माँ पिता जी की खुशी-भरी
नज़रो को दे न सकी
अब ये प्रश्न यहां केवल
जीवन या जीवनयापन का नहीं था।
यह प्रश्न अब अस्तित्व का था
मेरे जन्म से जुड़े कलंक का था।

मेरे जन्म पे तालियाँ बजाने कोई घर नहीं  आया।
आता भी कैसे ?
अब ताली बजाने वाला खुद ही उनके घर आ गया था।

तालियों से स्वागत नहीं, तालियों की 'सोहबत' मिली मुझे।
दायरे में सामाजिक रिश्ते नहीं थे मेरे
अब न कोई माँ-पिता ना ही कोई भाई-बहन
समाज ने केवल मुझे छक के जीने को 'छक्के' की ज़िंदगी दी है।

यहाँ रौशनी के लिए 'दीये' नही ट्रैफिक लाइट मिली हमें
यहाँ संगीत तो मिला लेकिन कला नही कमाई के रूप में।

आज समाज के बहुमत से कहना है
समझाना है, जताना है,
कुछ अपनी जुबानी बताना है।
हम सब ने वह वजूद अपनाया जो हमें जन्म से मिला
फर्क सिर्फ इतना है; तुमने उससे अपना गुरूर बड़ाया
तो उसे हमने अपनी ताकत बनाई है।
हाँ, हमने साहस दिखाया है।
पुरुष के शरीर में स्त्री को अपनाया है।
स्त्री के शरीर में पुरुष को सहज बनाया है।

हमने अपने एहसास को अपनाया है,
हमने अपने विभिन्न अस्तित्व को 'सम्पूर्ण' बनाया हैं।
हाँ! हमने यह वजूद स्वयं बनाया हैं।
......
कवयित्री - श्रेयसी दत्ता 
ग्राम - रांटी (मधुबनी)
माँ का ईमेल आईडी - duttachandana01@gmail.com
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Thursday, 23 July 2020

विजय मोहन की फुटकर रचनाएँ

 फुटकर रचनाएँ 

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1
# हास्य लघु कहानी#
हमारे पड़ोसी अपनी पत्नी के साथ बालकनी में खड़े थे। उन्होंने हमसे कहा मेरे अकाउंट में 15 सो रुपए आ गया है बैंक जाकर पता लगाना है कहां से आया।
कुछ देर के बाद उनकी पत्नी  बोली यह पैसा मैंने आपके अकाउंट में डाले हैं क्योंकि कामवाली नहीं आ रही है आप काम कर रहे हैं तो आपको तनख्वाह चाहिए ना।
पड़ोसी बोले अरे भाई काम वाली को ३०००/-देती हो तुम मुझे १५००/- क्यो।
उनकी पत्नी का जवाब सुनिए। :-
कामवाली को 3000 देते हैं खाना पीना नहीं देते तुम खाना खाते हो इसलिए 15 सौ मिलेगा मंजूर हो तो बोलो नहीं तो पुलिस को फोन करेंगे की 5 दिन से खांस  रहे हैं तब आपको हॉस्पिटल जाना होगा १५ दिनो के लिए।
पतिदेव बोले 1500 पर मंजूर है ।
"यह नारी शक्ति है" ।

2
एक किराना दुकान में यह पोस्टर लगा हुआ था। एक महिला विनम्र स्वभाव से बोली- भैया आप होम डिलीवरी कराते हो किराना वाला बोला हॉ बहनजी आप लिखा दो हम जल्दी ही भेज देंगे।
बहन जी बोली, हमें सामान नहीं चाहिए हमें होम डिलीवरी चाहिए,
आप आ जाओ या आपका कोई टीम भेज दो चूँकि अभी कोरोना का समय चल रहा है हम कोई नर्सिंग होम में जा नहीं सकते है।
इसलिए भैया तुम आ जाओ या तुम्हारा टीम आ जाए। किराना वाला बहुत मुश्किल में पड़ा और किसी नर्सिंग होम से संपर्क करके उनका टीम बहन जी के घर भेज दिया।
तत्काल उस पोस्टर को हटाया और हिंदी में लिखा की मेरे यहॉ से कच्चा खाद्य पदार्थ आपके घर के द्वार तक पहुंचाया जाएगा।
पोस्टर्स लगाकर शांति से काउंटर पर बैठा।
होम डिलीवरी लिखना बहुत खतरनाक हुआ।

3
Every Covid check
Important message.
रोजाना शाम को 7:00 बजे बोतल खोलो,
खुशबू लो।
अगर आपको खुशबू आ रही है,
मतलब आपकी नाक सही है,
और आप 50% ठीक हैं।
फिर उसको ग्लास में डालो,
और टेस्ट का पता चल रहा है,
मतलब आपकी स्वाद ग्रंथियां सही
काम कर रही है और आप 100%
सुरक्षित है।आप घर पे रहे।

4
#जीवनसाथी#
सच्चे जीवन साथी एक-दूसरे की खुशी के लिए जीते हैं, समर्पण और प्यार के बीच अंह की कोई जगह नहीं होती। सच्चे जीवन साथी एक-दूसरे के आदर करते हैं। मेरे हमसफर दिल्ली से लौटते समय बोली थी अब हम लोग दिल्ली नहीं आएंगे। वह अपना बच्चन निभाई।
पर मैं पोता पोती औलाद के कहने पर उनके साथ दिल्ली चले गए। क्या करता, मैं अकेला हो गया था।
जीवनसाथी के कोने पर:- मैं कौन हूं पापा और अंकल? मैंने तो यह कभी नहीं चाहा था। क्यों मैं अकेला हूं........। मेरे सारे सपने टूट गए?
जिसे मैं ज्यादा चाहा वही मुझे अकेला छोड़ कर....
...चली गई। जैसे बिना पतवार के नैया नदी की धारा में ड्यूटी पर उतरती जा रही है। मैं विजय हर जगह विजय के पताका लहराता है। लेकिन अपनी जिंदगी में आ गये। धन दौलत औलाद नाम सब पा गये । लेकिन अपने मंजिल खो गए। कभी-कभी अपने को बहुत टूटा हुआ और हारा वह महसूस करता हूं। कारण अकेलापन।
जिंदगी यूं ही गुजरने लगी। लोग को समझाने लगे "मेरा घर मेरा ही होता है।" कुछ समय के बाद लोग बोलना छोड़ कर सहयोग करने लगे।
धीरे धीरे कुछ लिखने की ओर मुड़ा और कुछ लिखना  शुरू दिया। और उसमें जैमिनी अकादमी से अटल रत्न से  सम्मानित भी हुआ। लेखनी अच्छी होने पर समाज से प्रशंसा भी मिल रही है। जिससे शहर में अपनत्व होने लगा है।

5
 # शरीफ जेबकतरा#
70 के दशक की बात बता रहा हूं। मैं रांची से बोकारो आ रहे थे मेरे पॉकेट में ₹90 और एक मां के नाम पोस्ट कार्ड उसमें लिखा हुआ था मेरी नौकरी छूट गई है ।अभी पैसा भेजने में असमर्थ हूं। लेकिन इसको पोस्ट नहीं कर रहे थे, हिम्मत नहीं हो रहा था।मेरी मां कैसे घर चलाएगी। मैं दूसरे नौकरी के प्रयास में रांची गए हुए थे। वहां लगभग तय हो गया था जॉइनिंग लेटर आता तब वहां ज्वाइन करते ।
बस में मेरे बगल में एक शरीफ जेबकतरा आ के बैठ गया। रास्ता में किस समय मेरा पॉकेट काट लिया पता नहीं चला। दोनों व्यक्ति बोकारो उतरे और एक चाय की दुकान पर चाय पीने के लिए चाय का आर्डर दिए।
उसके बाद जब हाथ पॉकेट में डालें तो कुछ देर मन सन्न हो गया। और चाय वाले को मना कर दिया। बह व्यक्ति बोला चलो भाई मैं पिला देता हूं। और हम लोग चाय पी कर अपना-अपना रास्ता पकड़ लिये। पॉकेट में ₹90 और एक मां के लिए पत्र था। उस जमाने में ₹90 अभी के 900 के बराबर है। किसी तरह  खाने-पीने का इंतजाम किए यह कहकर कि नौकरी लग गई है पैसा दे दूंगा।
10 दिन के बाद एक मां का पत्र आया तो उसको पढ़ने की इच्छा नहीं थी  यही हम सोचते थे  कि मां पैसा मांगी होगी,लेकिन जब पत्र पढ़ें उसमें लिखा हुआ था की तुम कितना अच्छा बेटा हो ₹1000 भेज दिया है बहुत-बहुत आशीर्वाद। हम चिंतित हो गए हमने ₹1000 तो भेजे नहीं कौन भेज दिया है।अपने मित्रों से पता लगाने लगे किसी नहीं बताया।
पांचवा दिन एक पत्र आया उसमें लिखा हुआ था ₹90 तुम्हारा ₹910 मेरी ओर से तुम्हारी मां को ₹1000 भेजे हैं । तेरी मां मेरी मां  मां मां ही होती है ।इसलिए तुम्हारा जेबकतरा मां को ₹1000 भेजे हैं ।
तुम्हारा जेबकतरा।
आगे पीछे कोई भी पता नहीं था। इसलिए हम उसे शरीफ जेबकतरा नाम दिए आज तक 50 वर्ष हो गए हैं और वह चेहरा दिखाई नहीं पड़ा। यह लेख भुक्तभोगी लिख रहे हैं। अभी भी इंसानों में दिल है। नेकी काम पर विश्वास करते हैं।
..

लेखक - विजयेन्द्र मोहन
लेखक का ईमेल आईडी - mohan.vijayendra@gmail.com
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Monday, 20 July 2020

सावन पर कविताएँ - सरोज तिवारी और वेद प्रकाश तिवारी

दो कविताएँ

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कैसा सावन?
कवयित्री - सरोज तिवारी




ना कोई झूला ना हीं  कजरी
बस गिरता बरसात जहाँ।

ना लहराता आँचल और
ना हीं सखियों का साथ जहाँ।

ना बच्चों की छपक-छपाक
ना कागज की नाव जहाँ।

ना थिरकन ना धुमा चौकड़ी
ना मस्ती का भाव जहाँ।

ना छतरी ना छतरीवाला
बिजली चमके यहाँ-वहाँ।

हरा-भरा कैसा यह सावन
सिमटा है संसार जहाँ।

ना शिव भक्तों का रेला
ना कांवरियों की धूम जहाँ।

ना हरहर बमबम गूंजे
ना कोई उत्साह जहाँ।

कैसा भय घुटन यह कैसी
डूब गया संसार जहाँ।

हर्ष-विषाद एक हो गए
सावन का आनंद कहाँ।
.....

       
अबकी बार 
वेद प्रकाश तिवारी




अबकी बार सावन में नहीं करेगी 
कोई बिरहन अपने परदेशी का इंतजार 
बागों में झूले, सावन के गीत 
हाथों में मेहंदी, हरी चूड़ियां 
सब हैं उदास, अबकी बार
सावन में अबकी बार
नहीं जायेगा कोई कांवरिया
शिव के धाम
कोरोना के कहर के बीच
बिगड़ा है प्रकृति का ऐसा मिजाज
चाहे आए सावन या जाए आषाढ़
हो रही है लगातार 
बिन मौसम बरसात
कभी रिमझिम तो कभी मुसलाधार
कहीं आकाशीय बिजली का कहर
कहीं भूकंप, कहीं बाढ़
जिंदगी और मौत के बीच
जी रहा है संसार
चेहरा छुपाये बेबस निगाहों से
दूर से ही देख रहे है सब
एक दूसरे को
भय के वातावरण में 
सोचने को अब हैं विवश
मानव जाति ने डाला है 
प्रकृति के शिवत्व और शाश्वत सौंदर्य पर
ऐसा नकारात्मक प्रभाव 
इसलिए हो रहा है
उसके अनिष्टकारी स्वरूप से
हमारा साक्षात्कार ।
अंतिम विकल्प बचा है यही
अब जीना होगा सभी को
प्रकृति के साथ। 
....
रचनाकार - सरोज तिवारी और वेद प्रकाश तिवारी
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