Wednesday, 13 May 2020

माँ की बात निराली / कवयित्री - प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र'

कविता 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




माँ की हर बात बड़ी निराली
भर देती जीवन में हरियाली।

जब कभी मैं होता विफल
माँ देती मुझको सम्बल।

जब कोई करता मुझको निर्बल
भर देती माँ मुझमें आत्मबल ।

मेरे हिस्से का गम भी पी लेती
हर कोशिश कर खुशियां देती।

पिता से भी मेरे लिए लड़ लेती 
हर दिन एक नया मन्नत करती ।

 भविष्य मेरा हो उज्ज्वल
हर दिन कुछ करती  नवल।

जब उसके प्यार में मैं हुआ वाचाल
मौन व्रत रख बंद किया बोलचाल।

उसकी मौन भाषा ने वो समझाया
जो अब तक था समझ न पाया।

माँ के मौन में होती बड़ी ताकत 
पछताता मन दूर होती आफत।

माँ के मौन में भी ताकत है बड़ी 
लगता खड़ी है हाथ में लिए छड़ी।

ऐसा नहीं कि खाया नहीं उससे डांट
गलती पर डांटी,खड़ी की मेरी खाट।

माँ का था ये प्यारा नुस्खा
आँखों से बरसे बन बरखा।

डांट कर उसकी आँखें हो जाती नम
फिर मैं सोचूँ दूर करूँ कैसे उसका गम।

फिर मैं पढ़ता हो जाता सफल
माँ खुश होती दुःख होता विफल।

माँ की खुशियाँ ही मेरा सम्बल
अब मैं भरता उसमें आत्मबल।
.....
कवयित्री - प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र'
कवयित्री का ईमेल आईडी - kinshukiveerji@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Monday, 11 May 2020

युवा प्रतिभा: जगदीप सिंह मान / "माँ" और अन्य कविताएँ

कविताएँ

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए



1. माँ 

माँ तू स्नेह की सूरत है, तू ममता की मूरत है
तू पावन प्रीत निर्झरी है, मातृरूप अवतारी है
ये जग है ये कानन काँटों का
तू फुलवारी है, ओ माँ
माँ तू स्नेह की सूरत है,तू ममता की मूरत है।

मामूली नाम नहीं है माँ तू 
जीवन का सरताज है तू 
स्वर्ग सा बचपन मिला मुझे
इस वैभव की वरदानी है तू ,ओ माँ
माँ तू स्नेह की सूरत है, तू ममता की मूरत है।

मैं जब हंँसता हूंँ तू हंँसती है मांँ
मैं जब रोता हूंँ तू रोती है मांँ
मेरे कष्टों को अपने कष्टों पे वारी है
सब कुछ मेरे पे तू बलिहारी है, ओ माँ
माँ तू स्नेह की सूरत है, तू ममता की मूरत है।

माँ तू केवल प्यार नहीं है
मांँ तू बस श्रृंगार नहीं है
माँ तू जग की वो शक्ति है
जिसका पारावार नहीं है, ओ माँ
माँ तू स्नेह की सूरत है,तू ममता की मूरत है।

मांँ बिना प्यार कहांँ है ?
मांँ बिना सूना सारा जहाँ है
माँ ने कुदरत को रचा या कुदरत ने मात
धन्य वही है जो जान ले, दोनों के जज्बात,ओ मांँ
माँ तू स्नेह की सूरत है,तू ममता की मूरत है।


2 दीप का साहस

अंँधेरों का काम है, अड़चनें लगाना
है 'दीप' का काम जग में, रोशनी फैलाना
परीक्षा लेते हैं तूफान, तिमिर में दीप का
उसका काम है जलना, वजह भी यही होती है
है हवाओं को खबर, दीप की फतह ही होती है

दीप में देवताओं का तेज होता है
अंधकार को चीरने का वेग होता है
दीप के साहस का कोई जवाब नहीं है!

ढलते सूरज ने प्रश्न किया
सारे संसार को सन्न किया
मेरी ‌जगह कौन कार्य करेगा ?

तब एक कोने से दीपशिखा का सहारा लेकर
एक दीप निकलकर आता है
सूरज दादा! आप तो आप हैं,
सृष्टि के प्रारब्ध हैं, सृष्टि के तेज हैं,
जगत की आत्मा, अदिति के आदित्य हैं
मैं आपका स्थान नहीं ले पाऊंगा 
और न कोई ले पाएगा..

पर,
आपकी अनुपस्थिति में
 मैं कार्य करूंँगा
मैं दीप हूँ
रोशनी का मोहताज नहीं
जगमग सबको कर जाता है
तब तक दीपक जलता है
जब तक सूरज नहीं निकलता है।


कवि - गदीप सिंह मान "दीप"
परिचय- हिन्दी शिक्षक, राजकीय बाल वरिष्ठ उच्च माध्यमिक विद्यालय, लाडपुर, दिल्ली
शिक्षा निदेशालय, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, भारत।
ईमेल आईडी- jagdeepmaan1044@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Saturday, 9 May 2020

मनु कहिन (27) - मनोदशा

विमर्श 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए





आपने अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना होगा! आज मौसम बड़ा सुहाना है। बड़ा ही प्यारा मौसम है आज ! मौसम बड़ा ही खुशगवार है ! फलां फलां फलां। पर, भला यह कैसे हो सकता है! यह एक सब्जेक्टिव चीज है।आप इसे वस्तुनिष्ठ कैसे बना सकते हैं। हम यह जरूर कहते हैं कि सूर्य अस्त हो चुका है या फिर सूर्य उदय हो चुका है। पर, वास्तविकता क्या है। सूर्य न तो अस्त होता है ना ही उदय होता है। दुनिया के एक भाग मे अगर सूर्य अस्त होता है तो कहीं दूसरे भाग मे उदय होता है।  उसी प्रकार अगर मौसम सुहाना है, अच्छा है या फिर खुशगवार है तो इसका मतलब यह नही कि यह सार्वभौम है। यह तो आपकी और  हमारी मनोदशा के अनुरूप सोचने का नजरिया है। हम किस प्रकार से सोचते हैं? हमारा सोच कितने आयामों से गुजरता है ! यह हमारी और आपकी मनोदशा ही तो है !

उस किसान से जाकर पूछें जिसने अभी अभी फसल काटकर काटी हुई फसलों को दालान मे रख दिया है या फिर खेतों मे फसल पककर तैयार खड़ी हो और तभी इस सुहाने मौसम की बैमौसम बरसात ने उसके सपनों को चूर चूर कर दिया जो उसने देख रखे थे ! अब वो सर पर हाथ रख कर गंभीर चिंता मे डुबा हुआ है। भाई किसानों के सोच का दायरा ही फसल और खेतों के बीच घूमता रहता है! उसकी आशा और निराशा सबके मूल मे खेत, खेती और फसल ही तो है।

उस  मेहनतकश मजदूर से पूछें जो अमूमन आपको गांव के बाज़ार मे या फिर शहरों के मुख्य चौराहों पर एक भीड़ के रूप मे मिल जाते हैं!  उन्हें आज कोई काम नही मिल पाया। क्या खाएंगे उनके बच्चे आज ! स व्यक्ति से पूछें जिसका कोई अपना अस्पताल मे जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा है!  उस व्यक्ति से पूछें जिसके घर आज किसी की मौत हो गई हो!  वाकई मौसम सुहाना है! अच्छा है! खुशगवार है! पर, निर्भर करता है परिप्रेक्ष्य पर! 

अगर अकाउंट्स की बात करें तो क्या डेबिट का मतलब सिर्फ और सिर्फ जाने से है ? या फिर क्रेडिट का मतलब सिर्फ और सिर्फ आने से है ! नहीं! बिल्कुल नहीं! किसी के लिए डेबिट है तो किसी और के लिए क्रेडिट है। 

कहने का मतलब हर चीज के दो पहलू होते हैं। आपको इन्हें समग्र रूप मे देखना होगा ! चीज़ें वस्तुनिष्ठ नही हो सकती हैं। हम इंसान हैं! पशुओं की तरह व्यवहार नही कर सकते। हमारे सोचने का दायरा विस्तृत है, व्यापक है, सब्जेक्टिव है! आपका वक्तव्य वास्तव मे यह बताता है कि आपकी 'मनोदशा/ क्या है। व्यक्ति 'मनोदशा' से इतर नही सोच सकता है।
किसी ने 'मनोदशा' के संदर्भ मे क्या खूब कहा है!
"चांदनी रात मे बरसात बुरी लगती है !
घर मे अर्थी हो तो बारात बुरी लगती है ! 
ऐ दोस्त मत छेड़ मेरे वीणा के तारों को 
 जब दिल मे दर्द हो तो हर बात बुरी लगती है !
........

लेखक - मनीश वर्मा 
लेखक का ईमेल - itomanish@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Friday, 8 May 2020

तुम इश्क करने की सोचते हो नादान हो क्या / कवि - अमीर हमज़ा

हास्य-कविता 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




तुम इश्क करने की सोचते हो नादान हो क्या
उसे अपना  बनाना चाहते हो  नादान हो क्या

फिर फोन मैसेज  व्हाट्सएप व चैटिंग करोगे 
वक्त बर्बाद करना  चाहते हो  नादान हो क्या

जब छोड़ कर  जाएगी तुम  अश्क  बहाओगे
तड़प  कर जीना  चाहते हो  नादान  हो  क्या

तुम्हारे खून ए  जिगर से वह  मेहंदी  रचाएगी 
ज़हर ए जुदाई पीना चाहते हो नादान हो क्या

तुम्हारी हँसी खुशी जिंदगी  बर्बाद हो  जाएगी
पागल सा  हँसना  चाहते हो  नादान  हो  क्या

रात  भर  उसकी  याद  में  जुगनू  को  देखोगे
मजनू  सा मरना  चाहते  हो  नादान  हो  क्या

इश्क  का  समंदर   होता  है  बहुत  ही  गहरा
उसमें डूब जाना  चाहते  हो  नादान  हो  क्या

तुम  खूब पढ़ो  लिखों  शोहरत  हासिल  करो
अपनी नाक कटाना चाहते हो नादान हो क्या.
.......
कवि-   अमीर हमज़ा
कवि का ईमेल आईडी  - nirnay121@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Monday, 4 May 2020

युवा कवि हेत राम भार्गव / "कहो मुझे भगवान" और अन्य कविता

1 कहो मुझे भगवान


(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए



जब जन्मीं ममता के आंचल,
हंसकर मां ने गले लगाया l
सबने बता कर भार घर का
खुशियों से मुझको ठुकराया l
तूँ ही बता मेरी जग में, है कैसी पहचान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं , कहो मुझे भगवान ?

शिशु का रोना मेरा
सब के कानों को कहराता l
पिता के पैरों की मैं बेड़ियां
हर कोई मुझे यही बताता था l
तूँ बता ईश्वर मुझको कहां मिलेगा सम्मान ?
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

टपकते आंसुओं सा बचपन,
कोई समझ नहीं पाया l
सब के बाद की पात्र कहकर
बेटों से अलग बताया l
घुटती रही इच्छाएं मेरी, टूटते रहे अरमान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

सदा पराया कहकर मुझको,
भाई जितना मान न पाया l
अबला मानकर वंचित किया,
कहीं पूरा सम्मान न पाया l
प्राण है मुझ में, प्रतिवेदना भी, मुझ में भी है जान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं ! कहो मुझे भगवान ?
नहीं पढ़ाया मुझको इतना,

नहीं मिल पायी सुविधाएं l
लड़की होने की अपराधिन,
बनी जीवन की बाधाएं l
सदा उलाहना में बीता, जीवन बनकर वर्तमान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?

हंसी-खुशी खेल की ठिठोली,
खुलकर खेल भी न पायी l
जिस मां ने जन्म दिया,
वह भी कहती मुझे परायी l
धन पराया साबित हो गई, होकर सनाथ संतान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं ! कहो मुझे भगवान ?

मेहंदी रची हाथों पर मेरे,
जब हुई मेरी विदाई l
पराए घर जा रही थी,
मैं होकर ओर भी परायी l
धन्य हुए माता-पिता मेरे, करके मेरा कन्यादान l
मैं कैसी रचना तेरी हूं , कहो मुझे भगवान ?

बेटी थी तब भी परायी,
बहू बनकर भी ओर परायी
काट रही हूं अपना जीवन l
ईश्वर! होकर तेरी परछाई l
सब मौन है इस प्रश्न पर, मैं हूं किसका स्वाभिमान ?
मैं कैसी रचना तेरी हूं, कहो मुझे भगवान ?


2. बेटी : चित्कार मेरी

कोई छोड़ गई निर्मोही ममता

मुझे जन्म देने के बाद 
क्यों रचना की तुमने प्रभु
सुन मेरी फरियाद l
मैं रो रही थी कचरे के ढेर में
किसी ने नहीं सुनी मेरी पुकार l
कीड़े मुझको काट रहे थे
कोई नहीं सुन पाया मेरी चित्कार ll
नोच नोच कर कुत्तों ने खाया
फिर भी बचे रहे मेरे प्राण l
निर्दयी हुई मेरी ममता कितनी
उतना ही तू निर्दयी भगवान ll
चीखना मेरा सुनकर कोई
दौड़कर वहां पर आया l
गोद उठाकर मुझको उसने
अपने गले लगाया ll
ममत्व प्यार लुटा कर
उसने वात्सल्य में पाला l
खिली कली मैं, उसकी बेटी
वह भगवान सा मेरा रखवाला l
बेटी होना अपराध क्यों है
यह समझ में नहीं आया l
जब बेटी ही है सृजना सृष्टि की
जिसे भगवान ने स्वयं बनाया l

कवि- हेतराम भार्गव  "हिंदी जुड़वाँ "
परिचय - (हिन्दी शिक्षक) राजकीय मॉडल उच्चतर शिक्षा विद्यालय करसान चंडीगढ़
शिक्षा विभाग केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़
कवि का ईमेल आईडी - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Sunday, 3 May 2020

युवा कवयित्री मीनाक्षी डबास 'मीनू' की कविताएँ - "रिमझिम रिमझिम" और अन्य

कविताएँ
(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




1 रिमझिम रिमझिम

रिमझिम रिमझिम
बरसे फुहार
मन नाचे मेरा
करे पुकार l
रिमझिम रिमझिम
बरसो पानी
भू पर लिख दो
फिर नई कहानी
रिमझिम रिमझिम
कदम बढ़ाए
डालों को तुम
चलो भिगोए l
रिमझिम रिमझिम
मद्धम मद्धम
मिट्टी के कण में
बस जाओ
रिमझिम रिमझिम
नाच नाच के
नदियों से तुम
आन मिलो, अब
रिमझिम रिमझिम
कूद फांद के
चट्टानों से भिड़ जाओ
रिमझिम रिमझिम
नाच नाच के
बच्चों का भी
जी बहलाओl
,,,,,

2 मोबाइल देवता

मोबाइल जी आप तो हो सबसे बड़े देवता
आपके बिना तो किसी का न दिन न रात l
बच्चा बूढ़ा, नाटा, मोटा या कोई पतला
सब तुम में लीन, न करते किसी से बात l
आज चहूं सिर्फ आपकी ही चर्चा
आधीन हुआ मानव, तूँ बना सबका खास l
घर गृहस्थी संबंध सब तू ही जग में
अंगूठे के स्पर्श में देखो सिर्फ तेरा एहसास l
छूट गए माता पिता बंधु प्रिय सब
बना चहेता तू सबका स्मार्ट जीवक अंग l
सबके ही हाथों में तू प्रसाद हुआ अद्भुत
कर दिए दीप पूजा ध्यान आती नमाज भंग l
एकांत मुस्काए एकांत रोए एकांत शांत है
साथ बैठे लोग फिर भी बना दिये अनजान l
किसी को किसी से न मतलब रहा अब
रिश्तो में भी बन बैठा तू रिश्तेदार महान l
दूर देशांतर की जिजीविषा में तूँ मुस्कान भरे
सूने घर परिवार में तूँ खुशियां लेकर आता l
दूर बैठों की बस तू ही एक आस बना
सभी काम बने बैठे तूँ जीवन आसान बनाता l
तू जगत का साक्षात देव बनकर
इस भू पर नए चमत्कार लेकर आया l
हर पल सब तेरा ध्यान करे पल पल
तू बन गया सबके जीवन का साया l
तेरे आगे बन बैठे सब नाते रिश्ते बौने
मानव को झूठ सच सब तू ही बुलवाता l
तेरा ही सहारा लेकर दुनिया चले अब
झूठ को सच सच को झूठ तू सब बनाता l
नन्हे नन्हे बाल मोहित तुम पर आंखें खो रहे
सब खेल में डूबे बना इनका भी प्रिय वरदान l
नादान दुनिया नहीं जानती मैं जानना चाहे
तूँ क्षरण करता जीवन तू है इतना महान l
घर में दो राह पाट दिए रिश्ते तूने बांट दिए
तू ही मियां बीवी के झगड़े झपट की मूल l
साथ-साथ सामाजिक जीवन भूले सब
आज एक यंत्र के गुलाम सब कितने नादान l
मोबाइल तूँ वास्तव में है महामंत्र महायंत्र है
तू मायाजाल महाकाल जिससे सब अनजान l
,,,,,,

कवयित्री - मीनाक्षी डबास 'मीनू'
परिचय - (हिंदी प्रवक्ता) राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार
शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली
कवयित्री का ईमेल आईडी - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Saturday, 2 May 2020

युवाकवि हरिराम भार्गव की कविताएँ -"मेरे घर बया का घोंसला" और अन्य

कविताएँ
(मुख्य पेज - bejodindia.in / ब्लॉग में शामिल हों / हर 12  घंटे  पर  देखिए -   FB+  Bejod  / यहाँ कमेन्ट कीजिए




1. मेरे घर बया का घोंसला 


नन्हें नन्हें नादान परिंदे
मेरे आंगन में मंडराते हैं 
पीछे पीछे दौड़े 
वे भागमभाग करते हुए 
बेलों के नीचे छुप जाते हैं 
घीया लौकी तोरी हरे- हरे 
ये छुपे हुए इनमें बिना डरे 
यहीं है घर इनका अपना 
यही रोज ठिकाना हुआ 
उड़ना अभी सीख रहे 
सब छुपे हैं, पर दीख रहे 
आंखें मटका मटकाकर 
अपनी ताकत दिखा रहे 
प्यारे-प्यारे नन्हें दुलारे 
मेरा आंगन महका रहे l

मैंने पूछा  मां से - कहां से आए? 
मां बोली - यह घर है सबका l
इनका भी घर, तेरा भी घर 
सबको प्यारा होता है घर
एक दिन बया आयी थी 
तिनके बिनकर कर लायी थी 
देखा गौर से मैंने जब 
उड़ी नहीं, वह रुकी रही 
घर के आले में ठहरी
समेत सारे तिनके 
एक घोंसला बनाया 
कुछ दिनों बाद देखा 
तीन अंडे चमक रहे 
नए जीवन की आशा में 
हमको कुछ कह रहे 
ममता जगा गयी बया 
एक कहानी बना गयी, 
हे बया फिर से 
घर की रौनक बढ़ाओ 
आओ बया मेरे घर आओ 
आकर घोसला बनाओ l

प्यार बांटते हैं पक्षी 
हिलमिल रहते सारे 
न कोई झगड़ा 
न कोई फसाद करे 
जीवन जीने की राह
हमको ये सिखाते 
फिर आग आगे आना बया
फिर मेरा घर सजाना बया
चहचाहट प्यारी सुंदर 
हम सबको भाती हैं 
नन्हें-नन्हें चीजों की अठखेलियां 
खुशियां देकर जाती हैं, काश! 
हम भी पक्षी बन जाएं 
संग इनके घोंसला बनाएं 
हम भी पक्षी बन जाएं 
संग इनके घोषणा बनाएंl
...


2 बादल 

आ रे बादल प्यारे बादल
घनघोर घटा छा रे बादल 
सूना पड़ा सारा संसार 
जीवन पुकारे बेशुमार l
रिमझिम रिमझिम 
बूंदों की ठंडी फुहार 
धरा पर बरसा रे बादल l
सूरज की धूप तपती
किसान थका हुआ है 
उसके घर झोलीभर 
खुशियां बरसा रे बादल l
बैलों के पैर जल रहे हैं
खुर में पड़े घाव भर जा 
शीतल धरा को कर जा 
आ रे बादल प्यारे बादल l 

पेड़ों पर मुरझाए पत्ते 
सूखी डाली डाली 
तेरी आस लगाए बैठी 
कृषकाओं की लाली 
इंतजार कर रही, दुल्हन
पिया मिलन की आस 
तेरे बरसने को ठहरी 
उसको तुझपर विश्वास l

सबका विश्वास, बन 
लौट ला होठों की मुस्कान 
मृग प्यासे दौड़े भागे 
मृगमरीचिका की लालसा 
प्राण छीन रही रे बादल l

कहीं प्यासे पपीहे कीर 
कहीं भूखे हैं चौपाये 
सब पानी पानी रोते 
अपना दर्द छुपाये 
कौन किसकी सुनता रे बादल l 
तू तो सुन, तू सबकी आशा 
रिमझिम रिमझिम 
बूंदों की ठंडी फुहार 
धरा पर बरसा रे बादल l

कवि - हरिराम भार्गव "हिंदी जुड़वाँ " 
परिचय - (हिंदी शिक्षक) राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय पूठकलां दिल्ली
 शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली
कवि का संयुक्त ईमेल - hindijudwaan@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com